मां भगवती के 51 शक्तिपीठों में से एक ज्वालामुखी मंदिर काफी प्रसिद्ध है। इस मंदिर जोता वाली मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान पर माता सती की जीभ गिरी थी। यहां माता ज्वाला के रूप में विराजमान हैं और भगवान शिव यहां उन्मत भैरव के रूप में स्थित हैं। इस मदिर का चमत्कार यह है कि यहां कोई मूर्ति नहीं है बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रहीं 9 ज्वालों की पूजा की जाती है। आजतक इसका कोई रहस्य नहीं जान पाया है कि आखिर यह ज्वाला यहां से कैसे निकल रही है। कई भू-वैज्ञानिक ने कई किमी की खुदाई करने के बाद भी यह पता नहीं लगा सके कि यह प्राकृतिक गैस कहां से निकल रही है। साथ ही आजतक कोई भी इस ज्वाला को बुझा भी नहीं पाया है। ज्वाला देवी की ज्वाला से संबंधित एक पौराणिक कथा भी है। कथा के अनुसार, भक्त गोरखनाथ मां ज्वाला देवी के बहुत बड़े भक्त थे और हमेशा भक्ति में लीन रहते थे। एकबार भूख लगने पर गोरखनाथ ने मां से कहा कि मां आप पानी गर्म करके रखें तब तक मैं मीक्षा मांगकर आता हूं। जब गोरखनाथ मिक्षा लेने गए तो वापस लौटकर नहीं आया। मान्यता है कि यह वही ज्वाला है जो मां ने जलाई थी और कुछ ही दूरी पर बने कुंड के पानी से भाप निकलती प्रतित होती है। इस कुंड को गोरखनाथ की डिब्बी भी कहा जाता है। मान्यता है कि कलयुग के अंत में गोरखनाथ मंदिर वापस लौटकर आएंगे और तब तक ज्वाला जलती रहेगी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मनमोहन हरी-भरी वादियों के बीच स्थित इस धार्मिक स्थल पर आकर श्रद्धालु को असीम शांति का अनुभव होता है। लोग दूर-दूर से माता के दरबार में पहुंचते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त माता के दरबार में आकार सच्चे मन से शीश झुकाते हैं उनकी मनोकामना जरुर पूरी होती है। माना जाता है कि हाटकोटी के मंदिर का निर्माण राजा विराट ने किया था। इस मंदिर का संबंध पांडवों से भी है। कहा जाता है कि पांडवों ने अपने गुप्त वास के दौरान इस जगह पर काफी समय व्यतीत किए था। हाटकोटी मंदिर में दुर्गा के मंदिर के साथ शिखरनुमा शैली में शिव का मंदिर बना हुआ है। मंदिर की छत लकड़ी से बनी हुई है, जिस पर देवी-देवताओं की आकृति बनाई गई हैं। मंदिर के गर्भगृह में लक्ष्मी, विष्णु, दुर्गा, गणेश आदि देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। इस मंदिर को लेकर एक लोककथा प्रचलित है कि बहुत वर्षो पहले यहां रहने वाली ब्राह्मण परिवार की दो सगी बहनों में बहुत कम उम्र में अल्प आयु में सन्यास ले लिया था। इस दौरान उन्होंने संकल्प लिया कि वह गांव-गांव जाकर लोगों के दुःख दर्द सुनेंगी और उन्हें बांटेगी। उन दो बहनों में से एक हाटकोटी गांव पहुंची और एक खेत में ईश्वर का ध्यान करते हुए लुप्त हो गई। जिस स्थान पर वह बैठी वहां एक पत्थर की प्रतिमा निकल पड़ी। जब इस घटना की जानकारी जुब्बबल रियासत के राजा को दी गई तो वह तुरंत उस स्थान पर पहुंचे। राजा ने प्रतिमा के चरणों में सोना चढ़ाने के लिए जैसे ही प्रतिमा के आगे कुछ खुदाई की तो वह दूध से भर गया। उसके उपरांत खोदने पर और राजा ने यहां पर मंदिर बनाने का निश्चय ले लिया। लोगों ने उस कन्या को देवी रूप माना और गांव के नाम से इसे ‘हाटेश्वरी देवी’ कहा जाने लगा।यह शिमला से 110 किलोमीटर है ,यहाँ लोग दूर दूर से आकर अपनी मनोकामना पूरी करते है।यहाँ आने के लिए बस से ओर गाड़ियों से भी आप आ सकते है ।