मनमोहन हरी-भरी वादियों के बीच स्थित इस धार्मिक स्थल पर आकर श्रद्धालु को असीम शांति का अनुभव होता है। लोग दूर-दूर से माता के दरबार में पहुंचते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त माता के दरबार में आकार सच्चे मन से शीश झुकाते हैं उनकी मनोकामना जरुर पूरी होती है। माना जाता है कि हाटकोटी के मंदिर का निर्माण राजा विराट ने किया था। इस मंदिर का संबंध पांडवों से भी है। कहा जाता है कि पांडवों ने अपने गुप्त वास के दौरान इस जगह पर काफी समय व्यतीत किए था। हाटकोटी मंदिर में दुर्गा के मंदिर के साथ शिखरनुमा शैली में शिव का मंदिर बना हुआ है। मंदिर की छत लकड़ी से बनी हुई है, जिस पर देवी-देवताओं की आकृति बनाई गई हैं। मंदिर के गर्भगृह में लक्ष्मी, विष्णु, दुर्गा, गणेश आदि देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। इस मंदिर को लेकर एक लोककथा प्रचलित है कि बहुत वर्षो पहले यहां रहने वाली ब्राह्मण परिवार की दो सगी बहनों में बहुत कम उम्र में अल्प आयु में सन्यास ले लिया था। इस दौरान उन्होंने संकल्प लिया कि वह गांव-गांव जाकर लोगों के दुःख दर्द सुनेंगी और उन्हें बांटेगी। उन दो बहनों में से एक हाटकोटी गांव पहुंची और एक खेत में ईश्वर का ध्यान करते हुए लुप्त हो गई। जिस स्थान पर वह बैठी वहां एक पत्थर की प्रतिमा निकल पड़ी। जब इस घटना की जानकारी जुब्बबल रियासत के राजा को दी गई तो वह तुरंत उस स्थान पर पहुंचे। राजा ने प्रतिमा के चरणों में सोना चढ़ाने के लिए जैसे ही प्रतिमा के आगे कुछ खुदाई की तो वह दूध से भर गया। उसके उपरांत खोदने पर और राजा ने यहां पर मंदिर बनाने का निश्चय ले लिया। लोगों ने उस कन्या को देवी रूप माना और गांव के नाम से इसे ‘हाटेश्वरी देवी’ कहा जाने लगा।यह शिमला से 110 किलोमीटर है ,यहाँ लोग दूर दूर से आकर अपनी मनोकामना पूरी करते है।यहाँ आने के लिए बस से ओर गाड़ियों से भी आप आ सकते है ।

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